नीले घन को चीरकर, झाँक रहा देखो दिनकर

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नीले घन को चीरकर, झाँक रहा देखो दिनकर। दोनों बाहों को फैलाकर , जीवन पाता मैं प्रबल-प्रखर, रश्मिकर ही तो है सुखकर, पोषित करता सब पूरित कर। जीवों को साँस दिलाने को झाँक रहा देखो दिनकर। id="ram"> प्रीति दुबे| सृष्टि नियंता -सूर्य googletag.cmd.push(function() { googletag.display('WD_HI_ROS_Left_336x280'); if


सृष्टि नियंता -सूर्य

नीले घन को चीरकर, झाँक रहा देखो दिनकर।

दोनों बाहों को फैलाकर ,
जीवन पाता मैं प्रबल-प्रखर,
रश्मिकर ही तो है सुखकर,
पोषित करता सब पूरित कर।
जीवों को साँस
दिलाने को झाँक रहा देखो दिनकर।
सृष्टि की उत्पत्ति
तुमसे ,
भौतिक विकास संभव तुमसे ,
पुष्पों का खिलना तुमसे,
पादप की हरिता तुमसे

जीवन अस्तित्व में लाने को झाँक रहा देखो दिनकर।

तुम जल वृष्टि आधार हो ,
चर-अचर जगत का सार हो ,
कुण्डिलिनी चक्र में व्याप्त हो,
सरमंडल करते राज हो,
भू पर प्रकाश बरसाने को
झाँक रहा देखो दिनकर।

मैं तुच्छ जीव जीवित तुमसे ,
है प्रणव मंत्र मुखरित तुमसे ,
सृष्टि संचलन “ रीत “ तुमसे,
ऊसर धरा की "प्रीत " तुमसे
जीवन दिशा दिखाने को झाँक रहा देखो दिनकर।''
सादर आभार - रंगीला प्रदेश : प्रकाशनार्थ
सूर्य से ही सृष्टि का संचालन

प्रीति दुबे ”कृष्णाराध्या”
इंदौर
मध्यप्रदेश

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