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डार्लिंग्स फिल्म समीक्षा: बिच्छू के लिए मेंढक क्यों बदले अपनी फितरत

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  • Posted on 06th Aug, 2022 09:21 AM
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Darlings movie review in Hindi डार्लिंग्स फिल्म में आलिया भट्ट, शैफाली शाह और विजय वर्मा लीड रोल में हैं। फिल्म एक ऐसी पत्नी की कहानी है जिसे पति प्रताड़ित करता है। कहानी सीरियस जरूर है, लेकिन कॉमिक अंदाज में कही गई है। जसमीत के. रीन का बेहतरीन निर्देशन और सभी कलाकरों की उम्दा एक्टिंग फिल्म को देखने लायक बनाती है। फिल्म के संवाद जमकर हंसाते हैं। नेटफ्लिक्स पर रिलीज यह डार्क कॉमेडी देखने लायक है। - डार्लिंग्स फिल्म समीक्षा : बिच्छू के लिए मेंढक क्यों बदले अपनी फितरत id="ram"> समय ताम्रकर| Last Updated: शनिवार, 6 अगस्त 2022 (13:46 IST) हमें फॉलो करें Darlings movie review in

समय ताम्रकर| Last Updated: शनिवार, 6 अगस्त 2022 (13:46 IST)
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movie review in Hindi फिल्म में पति द्वारा मारपीट की शिकायत करने गई थाने पहुंची महिलाओं से पुलिस ऑफिसर कहता है कि अब तो दुनिया बदल गई है, तो महिला जवाब देती है कि ट्विटर पर रहने वालों के लिए दुनिया बदली है, हम जैसों के लिए नहीं। यह जवाब भारतीय पत्नियों की स्थिति को दर्शाता है जो अब भी घरेलू हिंसा का शिकार आए दिन होती रहती हैं और शिकायत नहीं करतीं। बदलाव हुआ है, लेकिन ऐसा नहीं कि सीना फुलाया जा सके। उच्च वर्ग से निचले तबके तक महिलाओं पर उनके पति हाथ उठाते रहते हैं। 
 
डार्लिंग्स की नायिका बदरूनिस्सा (आलिया भट्ट) ने हमज़ा शेख (विजय वर्मा) से प्रेम-विवाह किया है। हमज़ा रेलवे में टिकट चेकर है और दिन भर शराब पीता है। वह बदरू से प्यार करता है, लेकिन आए दिन मारता-पीटता भी रहता है। बदरू सहती रहती है जबकि उसकी मां शमशुनिस्सा अंसारी (शेफाली शाह) का कहना है कि बदरू को तो हमज़ा का कत्ल कर देना चाहिए। मां-बेटी के घर आस-पास हैं। 
 
एक दिन बदरू की हमज़ा इतनी पिटाई करता है कि उसका बच्चा गिर जाता है। बदरू बेहद आहत होती है और मौका पाकर हमज़ा को बांध देती है। उसे नशे का इंजेक्शन देती है और अपनी मां और दोस्त जुल्फी (रोशन मैथ्यू) के साथ उसकी खूब पिटाई करती है। 
 
हमज़ा माफी मांगता है तो जुल्फी उसे छोड़ देता है, लेकिन हमज़ा फिर अपनी वाली पर आ जाता है। एक बार फिर वह बदरू के कब्जे में आ जाता है। बदरू, उसकी मां और जुल्फी को समझ नहीं आता कि हमज़ा का क्या करें? क्या उसकी हत्या कर दे? क्या उसको छोड़ दें? इसी बीच हमज़ा के गायब होने की खबर उसके ऑफिस और पुलिस स्टेशन भी पहुंच जाती है जिससे बदरू पर दबाव बढ़ता जाता है। 
 
परवेज़ शेख और जसमीत के. रीन द्वारा लिखी कहानी पढ़ने में या सुनने में बहुत गंभीर लगती है, लेकिन स्क्रीनप्ले कुछ इस कॉमिक अंदाज में लिखा गया है कि फिल्म से आप बंध से जाते हैं। लेखक बढ़िया गढ़े गए किरदारों और संवादों से दर्शकों का मनोरंजन करने में सफल रहे हैं। कई सिचुएशन ऐसी बनाई गई हैं जहां हंसी आती है। 
 
फिल्म के पहले घंटे में जरूर कहानी ठहरी हुई लगती है, लेकिन मजेदार सीक्वेंस दिलचस्पी जगाए रहते हैं, सेकंड हाफ में फिल्म में कई उतार-चढ़ाव आते हैं जो अंत तक बैठाए रखते हैं।
 
पुलिस थाने के दृश्य, हमज़ा के ऑफिस के सीन, मां-बेटी के बीच के कई सीन उम्दा हैं और मनोरंजन से भरपूर भी। विजय मौर्या, जसमीत के. रीन और परवेज़ शेख के संवाद सराहनीय हैं और हंसाते हैं। 
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जसमीत के. रीन का निर्देशन तारीफ के काबिल है। एक गंभीर कहानी को कॉमिक तरीके से पेश करने में उन्होंने सफलता पाई है। कहानी के अनुरूप उन्होंने अच्छा माहौल बनाया है। मेंढक और बिच्छू की कहानी को बढ़िया तरीके से मूल कहानी में गूंथा गया है। 
 
फिल्म का अंत इससे बेहतर नहीं हो सकता है। भले ही यह प्रताड़ित पत्नी की कहानी हो, लेकिन प्रताड़ित पति भी ऐसा कर सकते हैं। प्रताड़ित होने के बजाय बेहतर है अलग हो जाएं। 
 
बदरू को उसका पति बोलता है कि यदि मुझे छोड़ा तो सिनेमा कैसे देखोगी? घूमने कैसे जाओगी? क्योंकि कम पढ़ी-लिखी होने के कारण वह अपने पति पर निर्भर थी, लेकिन वह जवाब देती है कि मुझे मेरी मां ने भी तो अकेले पाला है, सब हो जाएगा, उसकी आशावादी सोच को निर्देशक ने अच्छी तरह से दर्शाया है। 
 
फिल्म के अंतिम दृश्य में बदरू थिएटर में बैठी है और उसके द्वारा देखी जा रही फिल्म 'महिला के खिलाफ हिंसा हानिकारक है' मैसेज के साथ खत्म होती है, निर्देशक की कल्पनाशीलता को दर्शाता है।
 
हमज़ा के किरदार को लेकर कुछ को आपत्ति हो सकती है कि वह इतना प्यार करता है तो फिर पत्नी को इतना मारता क्यों है? इसको लेकर फिल्म में थोड़ा विस्तार से बताया जाना था। हमज़ा को जब घर में ही कैद कर लिया जाता है तो वह मदद के लिए चिल्लाता क्यों नहीं है, जबकि वह ऐसी बिल्डिंग में रहता है जहां पर जरा सी आवाज पड़ोसियों के घर तक पहुंच जाती है। बदरू की मां ने अपने पति से परेशान होकर उसका कत्ल किया था, उसका सुराग किसी को कैसे नहीं लगा?  बिल्डर वाला ट्रैक भी आधा-अधूरा सा लगता है। इस तरह की कुछ कमियां जरूर हैं, लेकिन ये फिल्म देखते समय बाधक नहीं बनती।  
 
गुलज़ार के गीत और विशाल भारद्वाज का संगीत फिल्म की थीम के अनुरूप है। सिनेमाटोग्राफी और लाइट्स का इस्तेमाल सराहनीय है। बैकग्राउंड म्यूजिक सीन के अनुरूप दिया गया है। हमज़ा जब घर लौटता है तो पड़ोसियों के टेलीविजन की आवाज तेज हो जाती है कि अब मारपीट होने वाली है। 
 
एक्टिंग डिपार्टमेंट मजबूत है। लीड कलाकार आलिया भट्ट, और विजय वर्मा ने कमाल की एक्टिंग की है। आलिया और शैफाली की जुगलबंदी देखने लायक है कि कैसे वे एक ही दृश्य में रंग बदलती हैं। सपोर्टिंग कास्ट रोशन मैथ्यू, विजय मौर्या, राजेश शर्मा ने भी  बेहतरीन परफॉर्मेंस दिया है। डार्लिंग्स एक डार्क कॉमेडी है जिसमें एंटरटेनमेंट, मैसेज और बढ़िया एक्टिंग है। 
 
  • बैनर : नेटफ्लिक्स, रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट, एटर्नल सनशाइन प्रोडक्शन 
  • निर्माता : गौरी खान, आलिया भट्ट, गौरव वर्मा 
  • निर्देशक : जसमीत के. रीन 
  • संगीत : विशाल भारद्वाज
  • ओटीटी: नेटफ्लिक्स  
  • सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 15 मिनट
  • रेटिंग : 3.25/5 

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